एक रुकी हुई गाड़ी… और एक ऐसा फैसला जिसने एक लाख से ज़्यादा ज़िंदगियों को छू लिया
“कभी-कभी ज़िंदगी हमें वहाँ नहीं ले जाती जहाँ हम जाना चाहते हैं… बल्कि वहाँ ले जाती है जहाँ हमारी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।”

साल 2017।
एक साधारण-सा दिन।
एक साधारण-सा युवा।
और एक ऐसी घटना… जिसने आने वाले वर्षों में हजारों लोगों की ज़िंदगी बदल दी।
उस समय मेहुल भाई किसी NGO के संस्थापक नहीं थे।
वे एक मध्यमवर्गीय परिवार से थे। इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन में डिप्लोमा करने के बाद ISRO में कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर कार्य कर रहे थे। लगभग ₹12,000 की सैलरी थी। भविष्य के अपने सपने थे, करियर था और सामान्य जीवन था।
उन्हें बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि कुछ ही घंटों बाद उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल जाएगी।
एक रुकी हुई गाड़ी…
भोपाल की यात्रा के दौरान उनकी गाड़ी अचानक गोटा स्थित एक स्कूल के सामने बंद हो गई।
बार-बार कोशिश की।
गाड़ी स्टार्ट नहीं हुई।
आसपास कोई गैराज भी नहीं था।
धूप तेज़ थी।
वे सड़क किनारे खड़े सोच रहे थे—
“अब क्या करूँ?”
तभी कुछ छोटे-छोटे बच्चे उनके पास आए।
“भैया… क्या हुआ?”
उन्होंने पूरी बात सुनी और बिना कुछ सोचे उनकी मदद करने लगे।
किसी ने पानी लाकर दिया।
किसी ने गैराज का रास्ता बताया।
कुछ बच्चे खुद उन्हें गैराज तक छोड़ने भी गए।
गाड़ी ठीक हो गई।
लेकिन असली कहानी तो अब शुरू होने वाली थी।
बच्चों ने सिर्फ एक बात कही…
जाते-जाते उन बच्चों ने मुस्कुराकर कहा—
“भैया… हमारी स्कूल भी देख लो।”
मेहुल भाई उनके साथ स्कूल चले गए।
लेकिन स्कूल के अंदर जो उन्होंने देखा…
उसने उनकी सोच हमेशा के लिए बदल दी।
बच्चों के चेहरे पर मुस्कान थी…
लेकिन स्कूल में संसाधनों की कमी थी।
सपने बड़े थे…
लेकिन अवसर बहुत छोटे।
यहाँ तक कि पीने के साफ पानी की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी।
उन्हें सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात की हुई कि जिन बच्चों के पास खुद बहुत कम था…
उन्हीं बच्चों ने एक अनजान इंसान की सबसे पहले मदद की।
उसी पल उनके मन में एक सवाल उठा—
“अगर ये बच्चे मेरी मदद कर सकते हैं… तो क्या मैं इनके भविष्य के लिए कुछ नहीं कर सकता?”
उस रात वे सो नहीं पाए।
बार-बार वही बच्चे…
वही स्कूल…
वही मुस्कान…
और वही सवाल।
शायद उसी रात एक NGO नहीं…
एक मिशन जन्म ले चुका था।
लेकिन शुरुआत कैसे होती?
सवाल बड़ा था।
जेब छोटी थी।
सैलरी केवल ₹12,000।
समाज सेवा का कोई अनुभव नहीं।

न कोई संस्था…
न कोई टीम…
न कोई फंड।
फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी।
उन्होंने अपने दो सबसे करीबी मित्रों—
महेंद्र प्रजापति और केश चावड़ा—से बात की।
तीनों ने तय किया—
“जो होगा… साथ मिलकर करेंगे।”
हर महीने अपनी सैलरी से थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाया।
जरूरतमंद बच्चों के लिए स्टेशनरी खरीदी।
भोजन पहुँचाया।
वृद्धाश्रमों में समय बिताया।
अनाथालयों में मदद की।
और फिर…
27 नवंबर 2018 को उसी स्कूल में पहला स्टेशनरी वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
उस दिन किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यही छोटा-सा कार्यक्रम एक दिन हजारों लोगों के जीवन में बदलाव लाएगा।
फिर एक नाम मिला…
धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे।
दोस्त जुड़े।
स्वयंसेवक जुड़े।
लोगों ने सोशल मीडिया पर काम देखा।
फिर एक दिन तीन दोस्तों ने अपनी इस पहल को एक नाम दिया—
रेनबो फोर्स फाउंडेशन (श्री मेहुल वढवाना ,संस्थापक)

यह केवल एक नाम नहीं था।
यह उम्मीद का प्रतीक बन गया।
2019 तक लगभग 150 स्वयंसेवक इस मिशन से जुड़ चुके थे।
अहमदाबाद, खेड़ा, खंभात, पोरबंदर, वात्राल और कई क्षेत्रों में सेवा कार्य शुरू हो चुके थे।
फिर आया सबसे कठिन समय…
अभी संस्था बनी ही थी।
1 फरवरी 2020 को आधिकारिक रूप से Rainbow Force Foundation का पंजीकरण हुआ।
और कुछ ही दिनों बाद…
पूरा देश लॉकडाउन में चला गया।
हर जगह डर था।
भूख थी।
बेरोज़गारी थी।
लोग घरों में बंद थे।
लेकिन Rainbow Force Foundation के स्वयंसेवक सड़कों पर थे।
शुरुआत केवल ₹5,000 से हुई।
लेकिन लोगों का विश्वास बढ़ता
टीम ने भोजन, राशन, मास्क और जरूरी सामान हजारों जरूरतमंद परिवारों तक पहुँचाया।
उसी समय श्री मेहुल वढवाना (संस्थापक, रेनबो फोर्स फाउंडेशन) ने महसूस किया—
“सेवा का कोई धर्म नहीं होता… केवल इंसानियत होती है।”
सबसे बड़ा फैसला
कोविड के बाद उनके सामने दो रास्ते थे।
एक तरफ ISRO की सुरक्षित नौकरी।
दूसरी तरफ Rainbow Force Foundation।
एक तरफ निश्चित भविष्य।
दूसरी तरफ अनिश्चित संघर्ष।
उन्होंने नौकरी छोड़ दी।
क्यों?
क्योंकि उन्हें अपने स्वयंसेवकों का विश्वास नहीं तोड़ना था।
उनके लिए नेतृत्व का अर्थ था—
सबसे आगे चलना।
आज कहानी कहाँ तक पहुँची?
तीन दोस्तों की छोटी-सी शुरुआत…
आज एक बड़े सामाजिक आंदोलन में बदल चुकी है।
आज Rainbow Force Foundation—
- स्लम क्षेत्रों में शिक्षा पहुँचा रही है।
- वृद्धाश्रमों में सेवा कर रही है।
- अनाथ बच्चों के साथ खड़ी है।
- राशन और भोजन अभियान चला रही है।
- युवाओं को नेतृत्व और कम्युनिटी सर्विस से जोड़ रही है।
- स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित कर रही है।
अब तक का प्रभाव
- 1,00,000+ लोगों तक सहायता
- 400+ स्वयंसेवक
- 700+ विद्यार्थियों को इंटर्नशिप एवं कम्युनिटी सर्विस
- अनेक शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक विकास अभियान
- सामाजिक सेवा के लिए सम्मान और पुरस्कार
लेकिन मेहुल भाई कहते हैं—
“सबसे बड़ी उपलब्धि संख्या नहीं… किसी बच्चे की मुस्कान है।”
आखिर उनकी मंज़िल क्या है?
उनका सपना है—
ऐसा समाज जहाँ कोई बच्चा गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित न रहे।
जहाँ हर युवा सप्ताह में कम-से-कम एक दिन समाज सेवा करे।
जहाँ मदद केवल दान तक सीमित न रहे…
बल्कि लोगों को आत्मनिर्भर बनाने तक पहुँचे।

उनकी एक बात…
“अगर आप पैसे से मदद नहीं कर सकते… तो समय दीजिए। अगर समय नहीं दे सकते… तो किसी बच्चे को पढ़ाइए। अगर वह भी नहीं कर सकते… तो कम-से-कम किसी ज़रूरतमंद का हाथ थाम लीजिए। क्योंकि दुनिया बदलने के लिए हमेशा बड़े कदम नहीं… सच्चे इरादे चाहिए।”
आज लाखों लोग Rainbow Force Foundation को जानते हैं।
लेकिन इस पूरी कहानी की शुरुआत…
न किसी बड़े निवेश से हुई थी…
न किसी बड़े मंच से…
बल्कि एक रुकी हुई गाड़ी, कुछ मासूम बच्चों की मुस्कान…
और तीन दोस्तों के उस फैसले से हुई थी, जिसने साबित कर दिया—
“जब इरादे सच्चे हों, तो छोटी शुरुआत भी लाखों ज़िंदगियों में उम्मीद जगा सकती है।”